Wednesday, January 17, 2018
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10 साल बाद हुआ कांग्रेस की एक और खौफ़नाक साज़िश का पर्दाफ़ाश – किस हद तक गिर गयी थी कांग्रेस, जानकर दंग रह जायेंगे आप

समझौता ब्लास्ट तो आपको ध्यान ही होगा l जी हाँ 18 फरवरी 2007 भारत और पाकिस्तान के वीच चलने वाली ट्रेन समझौता एक्सप्रेस मे विस्फोट हुए। यह ट्रेन दिल्ली से अटारी, पाकिस्तान जा रही थी, विस्फोट हरियाणा के पानीपत जिले में चांदनी बाग पुलिस स्टेशन के अंतर्गत शिवा गांव के नजदीक हुए। विस्फोट से लगी आग में कम से कम 66 व्यक्तियों की मौत हो गई थी और 13 व्यक्ति घायल हो गए थे l मारे गए ज़्यादातर लोग पाकिस्तानी नागरिक थे और  यह विस्फोट पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी के भारत यात्रा के एक दिन पहले हुआ था l

जाँच के दौरान ट्रेन मे और विस्फोटक साम्रगियाँ भी पाई गयीं थीं और बाद मे बचे हुए आठ डिब्बों के साथ ट्रेन को पाकिस्तान के लाहौर शहर की ओर रवाना कर दिया गया था l इन विस्फोटों के बाद कथित हिन्दू आतंकवाद का नाम बाहर आया और तत्कालीन कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने इसे हिन्दू आतंकवाद बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी l

अब इस केस में 10 साल बाद जो खुलासा हुआ है वो बेहद चौंकाने वाला है l 18 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रैस में ब्लास्ट हुआ था इसमें 68 लोग मारे गए। दस साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अब तक आखिरी फैसला नहीं आया है। इस केस में दो पाकिस्तानी संदिग्ध पकड़े गए, इनमें से एक ने गुनाह कबूल किया लेकिन पुलिस ने सिर्फ 14 दिन में जांच पूरी करके उसे बेगुनाह करार दिया। अदालत में पाकिस्तानी संदिग्ध को केस से बरी करने की अपील की गई और अदालत ने पुलिस की बात पर यकीन किया और पाकिस्तानी संदिग्ध आजाद हो गया। फिर कहां गया ये किसी को नहीं मालूम….क्या ये सब इत्तेफाक था या फिर एक बड़ी राजनीतिक साजिश थी ?

इस मामले पर अब जो सच सामने आया है वो बेहद चौंकाने वाला और कांग्रेस की पोल खोलने वाला है l एक हिंदी न्यूज़ चैनल ने इसका खुलासा किया है जो आपको झकझोर कर रख देगा l इस खुलासे से ये साफ़ हो चुका है कि कांग्रेस ने किस तरफ सिर्फ अपने राजनैतिक फायदे और हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए कितनी घिनौनी साज़िश रची थी l कैसे पाकिस्तानी आतंकियों को छोड़कर हिन्दू आतंकवाद का शब्द रचा गया और फिर स्वामी असीमानंद को इसमें फंसाया गया l

दरअसल इस केस के पहले इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर थे इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह जो कि अब रिटायर हो चुके हैं। गुरदीप सिंह ने 9 जून को कोर्ट में अपना बयान रिकॉर्ड करवाया और इस बयान में इंस्पेक्टर गुरदीप से ने कहा है, ‘ये सही है कि समझौता ब्लॉस्ट में पाकिस्तानी अजमत अली को गिरफ्तार किया गया था। वो बिना पासपोर्ट के, बिना लीगल ट्रैवल डाक्यूमेंटस के भारत आया था।

दिल्ली, मुंबई समेत देश के कई शहरों में घूमा था। मैं अजमत अली के साथ उन शहरों में गया जहां वो गया था। उसने इलाहबाद में जहां जाने की बात कही वो सही निकली लेकिन अपने सीनियर अधिकारियों, सुपिरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस भारती अरोड़ा और डीआईजी के निर्देश के मुताबिक मैने अजमत अली को कोर्ट से बरी करवाया।’ इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने कोर्ट को जो बयान दिया वो काफी हैरान करने वाला है l

गौरतलब है कि पुलिस अधिकारी ऐसा तभी करते हैं जब उन पर ऊपर से दवाब आता है। आखिर इतने सीनियर अधिकारियों को पाकिस्तानी संदिग्ध को छोड़ने के लिए किसने दबाव बनाया ? एक ब्लास्ट केस में सिर्फ 14 दिन में पुलिस ने ये कैसे तय कर लिया कि आरोपी बेगुनाह है और उसे छोड़ देना चाहिए ? ये बेहद अहम सवाल अब सबके सामने आ रहे हैं l

सबसे बड़ी बात ये कि ब्लास्ट के बाद दो प्रत्यक्षदर्शियों ने बम रखने वाले का जो हुलिया बताया था वो अजमत अली से मिलता जुलता था। प्रत्यक्षदर्शी के बताने पर स्केच तैयार किए गए थे, और उस स्केच के आधार पर ही अजमत अली और मोहम्मद उस्मान को इस केस में आरोपी बनाया गया था। इंस्पेक्टर गुरदीप ने भी 12 दिन पहले कोर्ट को जो बयान दिया था उसमें कहा है कि ट्रेन में सफर कर रहीं शौकत अली और रुखसाना के बताए हुलिए के आधार पर दोनो आरोपियों के स्केच बनाए गए थे l फिर सवाल ये कि पुलिस ने अजमत अली को महज़ 14 दिनों में कैसे छोड़ दिया और दूसरा आरोपी कहाँ गया ? अजमत अली का भी कोई पता नहीं चला l सवाल इस बात का कि पुलिस ने आख़िर ऐसा किसके कहने पर किया l

ख़बरें ये तक हैं कि पाकिस्तानियों को बचाने के लिए और शांतिप्रिय हिन्दुओं को दुनियाभर में बदनाम करने के लिए कांग्रेस ने एक खौफनाक साजिश रची l कांग्रेसी नेताओं के दबाव में केवल 14 दिनों में गुनाह करने वाले पाकिस्तानी आतंकवाद को चुपचाप छोड़ दिया गया और उसके बाद बंद कमरे में हिन्दुओं को बदनाम करने की योजना बनायी गयी l

योजना के तहत इस केस में स्वामी असीमानंद को फंसाया गया ताकि भगवा आतंकवाद या हिन्दू आतंकवाद को अमली जामा पहनाया जा सके l इस केस में गुरदीप सिंह के बयान के मुताबिक़ जांच अपने अंजाम तक पहुंच ही रही थी कि तभी अचानक उनके सीनियर अधिकारियों, सुपिरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस भारती अरोड़ा और डीआईजी ने उन्हें पाकिस्तानी आतंकी को छोड़ने के निर्देश दे दिए और इन्ही के निर्देशों पर इंस्पेक्टर गुरदीप ने अजमत अली को कोर्ट से बरी करवाया l

आपको बता दें कि हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए इतनी बड़ी राजनीतिक साजिश रची गयी, वो भी देश की सबसे पुरानी पार्टी द्वारा? पाकिस्तानी आतंकी को रिहा करके निर्दोष स्वामी असीमानंद को फंसा कर भगवा आतंकवाद का नाम दिया गया और इसके बाद तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने AICC की मीटिंग में भगवा आतंकवाद शब्द का जिक्र करके सबको चौंका दिया और फिर पी चिदंबरम और दिग्विजय सिंह ने बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ झूठ फैलाने के लिए आये दिन भगवा आतंकवाद का जिक्र करना शुरू कर दिया l

कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने तो 26/11 को मुंबई में हुए आतंकी हमले को भी आरएसएस से जोड़ते हुए इसे भी भगवा आतंकवाद कहना शुरू कर दिया था और इस झूठ को फैलाने के लिए एक किताब भी लिख डाली थी l हालांकि कसाब के पकडे जाने से उसकी ये चाल सफल नहीं हुई l

सवाल ये है कि कांग्रेस की हिन्दुओं से ऐसी नफ़रत की क्या वजह है, जिसके लिए हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए सोची-समझी साजिश रची गयी? ये साफ है कि भगवा आतंकवाद का जुमला बनाने के लिए, हिन्दू आतंकवाद का हव्वा खड़ा करने के लिए इस केस में पाकिस्तानियों को बचाया गया और हिन्दुस्तानियों को फंसाया गया l इस साजिश के पीछे किसका शातिर दिमाग था? क्या पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह या सुशील कुमार शिन्दे में से कोई इस साजिश में शामिल था?

इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए जब इस हिंदी न्यूज़ चैनल ने गुरदीप सिंह से बातचीत की तो गुरदीप सिंह ने बताया कि शुरुआती जांच के बाद ही अजमत को छोड़ दिया गया था l उन्होंने उन बड़े अफसरों के बारे में भी बताया जिन्होंने आतंकी को छोड़ने के लिए दबाव बनाया l ऊपरी दबाव के चलते अजमत अली का ना तो नार्को टेस्ट किया गया, ना ही पोलीग्राफी टेस्ट किया गया l

अजमत अली को छोड़ देना तो एक बड़ा ट्विस्ट था ही लेकिन इससे भी बड़ा ट्विस्ट इस केस की शुरुआती जांच में आया था l शुरुआत में तत्कालीन मनमोहन सरकार ने कहा था कि समझौता ब्लास्ट के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है लेकिन फिर कुछ ही दिन बाद उसे भगवा आतंकवाद से जोड़ दिया गया l

पुलिस अधिकारियों की एक मीटिंग की नोटिंग से खुलासा हुआ कि 21 जुलाई 2010 को बंद कमरे में कुछ अधिकारियों की मीटिंग हुई और इस मीटिंग तय किया गया कि हरियाणा पुलिस समझौता एक्सप्रैस ब्लास्ट की जांच में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है इसलिए केस को नेशनल इनवेस्टिगेटिव एजेंसी को सौंप देना चाहिए और केस की जांच को भगवा आतंकवाद से जोड़ दिया जाए l

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