Wednesday, January 17, 2018
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पटाखों पर बैन के बाद हुआ अदालतों के बारे में बड़ा खुलासा – सारे राज़ हुए पर्दाफ़ाश – पूरा देश गुस्से में

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन लगा दिया और इसके बाद जब दिल्ली एनसीआर का क़ारोबारी संगठन इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने दुःख ज़ाहिर करते हुए ये कहा कि उसके फ़ैसले को किसी धर्म से जोड़कर न देखा जाए l इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन जारी रखा है l

आपको बता दें कि भारतीय न्याय व्यवस्था पर कई बार ऊँगली उठती रही है कि यहाँ इन्साफ मिलने में काफी लंबा वक़्त लगता है और आम इंसान को तो कई बार इन्साफ मिल ही नहीं पाता l अदालतों में करोड़ों केस पेंडिंग हैं, जो ना जाने कितने सालों से न्याय का इन्तजार कर रहे हैं l

इस दुखद स्थिति का मुख्य कारण है न्यायपालिका का आम जनता की समस्याओं के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया और शीर्ष पदों पर कब्जा करे बैठे कई ऐसे जज जिन्हें राजनीतिक पार्टियों द्वारा पुरस्कृत किया जाता रहता है l

जजों की नियुक्ति के पीछे का काला सच तब सामने आया था, जब कोंग्रेसी नेता और जाने-माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी का सेक्स स्कैंडल सामने आया था, जिसमे एक महिला उनसे पूछती हुई नज़र आ रही थी कि वो उसे जज कब बनाएंगे? उस वक़्त सिंघवी ना केवल सुप्रीम कोर्ट में वकील थे बल्कि जजों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम कमिटी के सदस्य भी थे l

यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के लोगों ने कभी उन न्यायाधीशों और वकीलों से सवाल करने की जहमत नहीं उठायी, जिनकी राजनीतिक पार्टियों की चमचागिरी करके ऊंचे पदों पर नियुक्ति हो गयी l

अंग्रेजों के वक़्त से देश में जजों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम लागू है, जिसमे वरिष्ठ जज ही नए जजों की की नियुक्ति करते हैं l इसने न्यायपालिका को केवल भ्रष्ट और पक्षपातपूर्ण बनाया है l

उदाहरण के तौर पर इस सिस्टम के तहत सुप्रीम कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति करते हैं, हाई कोर्ट के जज सेशन कोर्ट के जजों की नियुक्ति करते हैं, और ज्यादातर ऐसे में या तो नियुक्ति के लिए वरिष्ठ जजों को मोटी रिश्वत खिलानी पड़ती है और या फिर चमचागिरी करनी होती है l क्या यह पारदर्शिता है?

जो चमचागिरी करने में ज्यादा अच्छा है, ज्यादातर उसे ही नियुक्ति मिलती है l अंग्रेजों ने भारतीयों का शोषण करने के लिए इस सिस्टम को बनाया था ताकि न्यायपालिका में कोई आम इंसान कभी प्रवेश ही नहीं कर सके l कैसा रहेगा यदि आईएएस अधिकारी खुद ही नए आईएएस अधिकारियों की और आईपीएस अधिकारी खुद ही नए आईपीएस अधिकारीयों की नियुक्ति कर ले?

देश का बड़ा गर्क करने का इससे अच्छा सिस्टम कोई हो ही नहीं सकता l अभिषेक मनु सिंघवी के पास भी हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की पावर थी, यही कारण है कि अनूसुया सलवान नाम की महिला से उसने नियुक्ति के बदले सेक्स की मांग कर ली l अब ऐसे कई अन्य केस देखिये कि कैसे नेता कॉलेजियम सिस्टम का फायदा उठाकर अपने विश्वासपात्र और पिट्ठू लोगों को न्यायपालिका में जज बनाते हैं l

हाई कोर्ट का जज बनने के लिए दो मुख्य मानदंड हैं-

  1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए.
  2. उसे 10 साल वकालत का तजुर्बा होना चाहिए या राज्य सरकार का एडवोकेट जनरल होना चाहिए.

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, जो फिलहाल आय से अधिक संपत्ति के केस में शामिल है, उन्होंने अपनी बेटी अभिलाषा कुमारी को हाई कोर्ट जज बनाने के लिए उसे अपने राज्य हिमाचल प्रदेश का एडवोकेट जनरल बना लिया, जो कि परिवारवाद का सीधा मामला है l एडवोकेट जनरल बनाने के कुछ ही वक़्त बाद उन्होंने अपनी बेटी को कॉलेजियम के जरिये से हाई कोर्ट का जज बनवा दिया और उसे गुजरात हाई कोर्ट में पोस्टिंग दिलवा दी l

उसे गुजरात हाई कोर्ट भेजने के पीछे मुख्य उद्देश्य था तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का विरोध करना और हर मोर्चे पर उन पर हमला करना l गौर करने वाली बात ये है कि जज महोदय अभिलाषा जी के कई फ़ैसले  सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द भी किये गए l

लालू प्रसाद यादव ने भी यही किया, 1990 में जब लालू बिहार के सीएम थे, उन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण और वोटबैंक के लिए आफ़ताब आलम को इसी तरह पहले हाई कोर्ट का जज बनवा दिया और बाद में कॉलेजियम के जरिये वो भी माननीय सुप्रीम कोर्ट में जज बन गए l

मजेदार बात ये है कि गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ तीस्ता सीतलवाड़ द्वारा दायर किये गए सभी केस बेहद रहस्य्मयी तरीके से माननीय जज आफ़ताब आलम की बेंच के पास ही गए l अब समझ सकते हैं कि ये कोई संयोग नहीं बल्कि सुनियोजित साजिश थी l

बाद में एमबी सोनी की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने पाया कि नरेंद्र मोदी को जबरदस्ती दोषी ठहराने के लिए आफ़ताब आलम पक्षपाती फ़ैसले सुना रहे थे, जिसके बाद सोनी को भारत के मुख्य न्यायधीश से कहना पड़ा कि गुजरात दंगों के केस आफताब आलम के पास ना भेजे जाएँ l

मुख्य न्यायधीश ने आफ़ताब आलम द्वारा सुनाये गए 12 फैसलों की जांच की और पाया कि सभी फैसले नरेंद्र मोदी के खिलाफ पक्षपाती विचारों के साथ सुनाये गए थे l इसके बाद आफताब आलम को नरेंद्र मोदी और गुजरात दंगों से जुड़े केसों से हटा दिया गया l

इसी को देखते हुए मोदी सरकार ने कोलेजियम सिस्टम को हटाकर NJAC (नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन) को लागू करने का फ़ैसला किया था, मगर सुप्रीम कोर्ट के जजों को इससे दिक्कत है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के 28 जजों में से 20 जज कांग्रेस के राज में बनाये गए थे l

मोदी सरकार ने जब NJAC का प्रस्ताव पेश किया तो सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इसे भी खारिज कर दिया, क्योंकि NJAC में कोलेजियम की तरह नहीं बल्कि मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक कमिटी, जिसमें दो सुप्रीम कोर्ट के जजों के अलावा कानून मंत्री और समाज के दो प्रतिष्ठित व्यक्ति जजों की नियुक्ति करते हैं. इससे ना केवल न्यायपालिका का सिस्टम पारदर्शी होगा बल्कि चापलूस और भ्रष्टाचारियों की जगह काबिल लोग जज बनेंगे l इसे दो बार पेश किया गया और दोनों बार सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया l

क्या कोई आम इंसान अपने केस का जज खुद ही बन सकता है? नहीं! मगर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला खुद ही कर लिया कि उनके लिए क्या अच्छा है, क्या इसे सही कहा जा सकता है ?

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