Wednesday, January 17, 2018
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केजरीवाल के गाल पर फिर पड़ा थप्पड़ – हुई किरकिरी – लुटिया ऐसी डूबी कि ढूंढती रह गयी पूरी पार्टी – धरी रह गयी सारी अकड़

अरविन्द केजरीवाल l जी हाँ दिल्ली के सीएम और सोशल मीडिया पर अक्सर ख़बरों में रहने वाले अरविन्द केजरीवाल l हांलाकि ज़नाब आजकल बड़े शांत शांत से हैं और काफी दिनों से चुप हैं l पीएम मोदी पर जुबानी हमला नहीं किया है और आजकल तो एलजी साहब से भी नोंकझोंक की ख़बरें कम ही हैं l

खैर ज़नाब अभी शांत हैं लेकिन पहले इतना कुछ बोल चुके हैं कि वो अभी भी उनके आड़े आ रहा है l गुजरात विधानसभा चुनावों में लड़ने की माननीय की बहुत इच्छा थी और एक वक़्त तो ये दावे भी ठोंके जा रहे थे कि गुजरात में जीत आम आदमी पार्टी की ही होगी l खैर चुनाव प्रचार जब शुरू हुआ तो हाथ पीछे खींच लिए गए लेकिन परदे के पीछे से उमीदवार खड़े भी किये गए और उन्हें जिताने की कोशिश भी लेकिन गुजरातियों ने ऐसा सबक सिखाया कि केजरीवाल साहब अब गुजरात जाने से भी डरेंगे l

दरअसल गुजरात विधानसभा चुनावों में माननीय अरविन्द केजरीवाल साहब की पार्टी को “नोटा (NOTA)” से भी कम वोट मिले हैं l जी हाँ ज़मानत जब्त शब्द तो अलग है लेकिन यहाँ तो वोट नोटा से भी कम मिले हैं l गुजरात जीतने का ख्वाब देखने वाले केजरीवाल साहब को गुजरातियों ने ऐसा तमाचा जड़ा कि ज़नाब भूल नहीं पायेंगे l

गुजरात विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने नोटा यानी कोई भी पसंद नहीं वाले ऑप्शन का जमकर इस्तेमाल किया है। ईवीएम पर यह बटन दबाने वाली उंगलियों की संख्या आम आदमी पार्टी, एनसीपी और मायावती की बीएसपी जैसी पार्टियों को मिले वोट से ज्यादा रही है।

ईवीएम में नोटा बटन के जरिए मतदाता यह बता सकते हैं कि चुनाव मैदान में उतरा कोई उम्मीदवार उनका प्रतिनिधि बनने लायक नहीं है और गुजरात विधानसभा चुनाव में 5,51,294 मतदाताओं ने यह बटन दबाकर अपने इलाके के उम्मीदवारों को खारिज कर दिया।

आपको बता दें कि 2012 के विधानसभा चुनाव में नोटा का ऑप्शन नहीं था। ऐसे में तुलना करने के लिए 2014 केदीय चुनाव का आंकड़ा उठाया जा सकता है। उस चुनाव में गुजरात के 4.2 लाख मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया था। विधानसभा चुनाव में नोटा का वोट शेयर 1.8 पर्सेंट रहा है लेकिन जो एक असेंबली इलेक्शन के लिहाज से असामान्य बात नहीं है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक नोटा वोट कुल मतों के 0.8 से 3 पर्सेंट के बीच रह सकता है।

गुजरात में आम आदमी पार्टी ने कुल 29 सीटों पर ही प्रत्याशियों को उतारा था, जहां पार्टी को केवल 29 हजार 517 वोट हासिल हुए। वहीं इन 29 सीटों पर 75 हजार 880 लोगों ने नोटा का लिकल्प चुना। नोटा का विकल्प चुनने वालों की संख्या 2.5 फीसदी अधिक रही।

गुजरात में नोटा की अहमियत बढ़ जाती है क्योंकि कई विधानसभा क्षेत्रों में सफल रहे उम्मीदवार मतों के मामूली अंतर से जीते हैं। मिसाल के लिए कपराडा असेंबली सीट पर कांग्रेस के जीतूभाई चौधरी ने बीजेपी के मधुभाई राउत को 170 वोटों से हराया है। दिलचस्प बात यह है कि यहां नोटा पर 3868 वोट पड़े हैं जिसको कांग्रेस के जनादेश के तौर पर देखा जा रहा है।

गुजरात में बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी लेकिन बहुत से जानकारों को लगता है कि कांग्रेस इस सेंटीमेंट को पूरी तरह भुना पाने में नाकाम रही है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2013 में नोटा को पेश किया गया था। इसका विकल्प पहली बार छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और मिजोरम के विधानसभा चुनावों में दिया गया था। पहली बार में नोटा का वोट शेयर 1.85 पर्सेंट रहा था।

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