Tuesday, January 16, 2018
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सेना के इस जज्बे को नमन करे बिना नहीं रह पाएंगे आप – 19 घंटों तक पैदल चलकर दी चीन को मात – देखते रह गए जिनपिंग

भारतीय सेना सीमा पर डटी है और हर भारतवासी को यकीन इस बात का है कि जब तक भारतीय सेना के रणबांकुरे सीमा पर तैनात हैं, तब तक देश पर कोई आंच नहीं आ सकती l आज हम जो ख़बर आपको  बताने वाले हैं, उस ख़बर को पढ़ने के बाद आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जायेगा और आपको अपने भारतीय होने के साथ साथ भारतीय सेना के जवानों पर भी फक्र महसूस होगा l

दरअसल अरुणाचल प्रदेश के तूतिंग इलाके में चीनी सेना की रोड बनाने वाली टुकड़ी की घुसपैठ की खबर मिलते ही भारतीय सैनिक रवाना हो गए थे और 19 घंटे पैदल चलकर मौके पर पहुंचे थे। अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सियांग जिले में सड़क नहीं होने की वजह से भारतीय सैनिकों को पैदल घुसपैठ स्थल तक पहुंचना पड़ा और इसमें 19 घंटे लग गए।

भारतीय सेना के 120 जवान राशन के साथ सीमा पर भेजे गए ताकि वे वहां पर करीब एक महीने तक आसानी से रह सकें। सीमा पर सड़क नहीं होने और खच्चर आदि की सुविधा न होने की वजह से भारतीय सेना को अपने 300 पोर्टर लगाने पड़े जिससे सैनिकों के लिए राशन वहां पहुंचाया जा सके।

एक रक्षा सूत्र ने कहा कि  ‘शुरू में ऐसा लगा कि चीनी सेना डोकलाम के बाद विवाद का एक और मोर्चा खोलना चाहती है। हमें यह विश्वास था कि वहां पर लंबे समय तक रुकना पड़ सकता है। डोकलाम विवाद से सबक लेते हुए हमने 28 दिसंबर को ही घुसपैठ स्थल के लिए सैनिकों को रवाना कर दिया।’

उन्होंने बताया कि दूसरी तरफ छह जनवरी को फ्लैग मीटिंग के लिए आए चीनी सैनिक सीमा तक अपने वाहन से आए थे। मामला तत्काल सुलझ गया और चीन के सैनिक सड़क बनाने वाली अपनी मशीनों के साथ वापस लौट गए। हालांकि उनके उपकरणों को स्थानीय लोगों ने नुकसान पहुंचा दिया था।

सूत्र ने बताया कि स्थानीय लोगों के विरोध के बाद चीन के सिविलियन वर्कर अपने उपकरण छोड़कर भाग गए। उन्होंने कहा, ‘लेकिन अगर वे बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों के साथ वापस आते तो क्या होता। इसी आशंका को देखते हुए हमने सबसे पहले रक्षात्मक उपाय किए लेकिन हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संसाधनों को जमा करना था। हालांकि इसमें भी चुनौतियां और कठिनाइयां थीं।’

पोर्टर के आने से पहले सेना ने हेलिकॉप्टर से 100 पैकेट भोजन और 30 हजार पैकेट चॉकलेट गिराया। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भीषण ठंड और पथरीली जमीन को देखते हुए चॉकलेट जिंदा रहने के लिए ऊर्जा के स्रोत के रूप में काम करता है।

उन्होंने बताया कि  ‘शुरू में पानी का कोई स्रोत नहीं था और पानी की केन को हेलिकॉप्टर से गिराना पड़ा। कुलियों का काम काफी कठिन था। प्रत्येक आदमी को 10 से 15 किलो राशन ले जाना था। साथ ही उन्हें वापस नीचे आने और दूसरी यात्रा से पहले आराम करना भी जरूरी था। हमने 120 जवानों के लिए 30 दिन का राशन भेजा। प्रत्येक सैनिक को करीब डेढ़ किलो राशन की जरूरत होती है जिसमें पानी और मिट्टी का तेल शामिल है।’

ख़बर के मुताबिक़ भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी के पहुंचने के बाद चीनी सेना की सड़क बनाने वाली टुकड़ी के जवान वापस लौट गए। उन्होंने बताया कि जिस जगह पर घुसपैठ हुई है, वहां शुक्रवार को तीन फुट बर्फ पड़ी थी। उन्होंने कहा, ‘हमने अपने सैनिकों को नजदीक के नीचले इलाकों में वापस बुला लिया है।’ इस जगह पर एक निश्चित समय पर ही गश्त लगाई जाती है।

उन्होंने बताया कि दूसरी तरफ चीनी सेना को भौगोलिक लाभ है। सूत्र ने कहा, ‘चीन की तरफ की मिट्टी कठोर और हमेशा जमी रहती है। हमसे उलट वे आसानी से सड़क बना सकते हैं। भारतीय क्षेत्र में मिट्टी भुरभुरी है और भूस्खलन का खतरा बना रहता है। इससे जो भी सड़कें बनेंगी वे नष्ट हो जाएंगी।’

 

यह शायद डोकलाम में देरी से प्रतिक्रिया के चलते चीनी सैनिकों के साथ 70 दिनों तक चले गतिरोध की सीख थी कि 28 दिसंबर को एक कुली से सूचना मिलते ही टुकड़ी रवाना कर दी l चीनी सेना के सड़क निर्माण की सूचना एक कुली ने दी थी, जिसके बाद तुरंत सैनिकों को मैकमोहन लाइन के लिए रवाना किया गया।

भले ही सेना ने इस मामले में जीवट दिखाया, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या भी इससे उजागर होती है कि सैनिकों को पैदल इतना लंबा सफर तय करना पड़ा।

गौरतलब है कि हाल में चीन की एक टीम के बारे में खबर आई थी, जिसने भारतीय क्षेत्र में करीब डेढ़ किमी भीतर घुसकर सड़क निर्माण कर लिया था। अरुणाचल प्रदेश में अपर सियांग जिले में ट्यूटिंग इलाके का बिशिंग गांव उस जगह से नजदीक है जहां चीन की सड़क बनाने वाली मशीनें चली थीं। यह क्षेत्र वास्तविक नियंत्रण रेखा या मैकमोहन लाइन के 1.25 किमी अंदर की तरफ है। सड़क सियांग नदी के पूर्वी छोर पर बनाई गई थी, जो तिब्बत से बहकर आती है। वहां उसे यारलंग सांगपो कहा जाता है।

वैसे तो, चीन की टीम ने अंतरराष्ट्रीय सीमा से काम शुरू किया था। बिशिंग तक गाड़ी से पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है। स्थानीय युवा जॉन पोर्टर के तौर पर काम करता है और ITBP चौकियों तक सामान पहुंचाता है। इसी युवा ने पिछले महीने सबसे पहले चीन की खुदाई करने वाली मशीनें देखी थीं। उस समय जॉन अपने रोजमर्रा के काम में लगे हुए थे। फौरन उन्होंने ITBP को अलर्ट किया था और बाद में सेना तक सूचना पहुंची।

ट्यूटिंग सर्कल के अपर उपायुक्त इन-चार्ज के. अपांग के मुताबिक़ ‘हम नीतियों से बंधे हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के नियमों के अनुसार किसी गांव में कम से कम 100 लोग होने चाहिए तभी सरकारी सड़क वहां बनाई जा सकती है। बिशिंग की आबादी मात्र 54 है, जिसमें 16 परिवार हैं। यही वजह है कि यहां अब तक रोड नहीं बनी।’

वह जगह, जहां तक चीन की खुदाई करने वाली मशीनें पहुंचीं, वह इलाके का सबसे ऊंचाई वाला क्षेत्र है और यह करीब 4 हजार फीट है। बिशिंग से यहां तक पहुंचने के लिए करीब 8 से 10 दिन लग सकते हैं। गांववालों को करीब 4 किमी चलना पड़ता है और उसके बाद सियांग नदी को पुल के जरिए पारकर जेलिंग पहुंचा जा सकता है। इसके आगे भी 4 किमी चलेंगे तब जाकर वह आखिरी पॉइंट मिलेगा, जहां तक गाड़ी से आने-जाने के लिए सड़क बनी है।

अपांग ने बताया कि  ‘वह इलाका जहां चीनी आ गए थे, वह काफी दुर्गम है और गांव के शिकारियों के अलावा दूसरा कोई वहां नहीं पहुंच सकता है। वहां बिल्कुल खड़ी चढ़ाई है। इस घटना के सामने नहीं आने तक हम सभी सोचते थे कि यह इलाका नो मैन्स लैंड है क्योंकि वहां कोई नदी नहीं है या कोई धारा ही, जिससे अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण किया जा सके।

हाल में जब हमने गूगल मैप देखा तब हमें एहसास हुआ कि यह हमारी जमीन है।’ उन्होंने आगे बताया कि चीन की टीम पहले ही 1250 मीटर (1.25 किमी) लंबी सड़क भारतीय क्षेत्र में बना चुकी थी।

अपांग ने बताया कि  ‘अब सबकुछ सामान्य है। उस जगह पर चीन और भारतीय सेना के जवानों ने आपस में हाथ मिलाया और वे दो खुदाई करने वाली मशीनों समेत सारा सामान ले गए। हमें यह नहीं पता कि उनका ऐसा करने का मकसद क्या था। सेना इस समय वहां ITBP के जवानों के साथ तैनात है।’

हालांकि एक रक्षा सूत्र ने बताया कि डोकलाम के बाद चीनी शायद दूसरा फ्रंटियर खोलना चाहते थे। सूत्र ने कहा, ‘चीन की ओर से सड़क बनाने का यह कदम ऐसे समय में उठाया गया जब सीमा पर सेना की महीनेभर चली सालाना EWT (अर्ली वॉर्निंग टेस्ट) का समापन हुआ है। डोकलाम गतिरोध के कारण इस समय EWT तैनाती काफी ज्यादा थी, लेकिन महीना बीतने के बाद सभी अतिरिक्त सैनिकों को वापस बुला लिया गया था और तब यह सड़क निर्माण का मामला सामने आया।’

आपको बता दें कि EWT एक अभ्यास है, जब सभी लोकेशन से सैनिक और कमांडर्स ऑपरेशनल एरिया की तरफ मूव करते हैं, जो सेना के हर फॉर्मेशन से काफी अलग होती है। वे सभी अपने बेसों की तरफ लौटने से पहले यहां एक महीने तक रहते हैं। घुसपैठ वाले इस इलाके के दूसरी ओर चीन का न्यिंगची प्रांत है जहां चीन की PLA की तिब्बत मिलिटरी कमांड ने डोकलाम में तनातनी के समय युद्धाभ्यास किया था।

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