Wednesday, January 17, 2018
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इस मुस्लिम ने दी भारत को गाली तो फूट पड़ा श्वेता सिंह का गुस्सा – बोलीं “ देश के लिए गोदी…..”

आपको याद ही होगा पिछले साल AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने एक बहुत विवादित बयान दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि गर्दन पर कोई छुरी भी रख दे, तब भी वह ‘भारत माता की जय’ नहीं बोलेंगेl

अब कल ही एक और ऐसी ही खबर आईl दरअसल महाराष्ट्र के बीजेपी विधायक ने कहा के वह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से वंदे मातरम गीत को राज्य के हर स्कूल और कॉलेज में अनिवार्यता लागू करने की मांग करेंगे, जिसको लेकर समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम के नेता विरोध में खड़े हो गए हैं। आपको बता दें कि महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी के विधायक राज पुरोहित ने मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले को महाराष्ट्र में भी लागू करने की मांग उठाई। जिसके बाद समाजवादी पार्टी विधायक अबू आसिम आजमी भड़क गए l

अबू आसिम आजमी का कहना है कि वंदे मातरम गाने को लेकर भले ही हमें देश से निकालदे हैं या गोली मार दें लेकिन हम या कोई सच्चा मुसलमान वंदेमातरम नहीं गाएगा। मेरा मजहब वंदे मातरम गाने की इजाजत नहीं देता है।

सर कटा लेंगे लेकिन वन्दे मातरम नहीं गायेंगे l यही वो लाइनें हैं, जिन्हें देश के कुछ कट्टर मुस्लिमों ने तब कहा जब देश में वन्दे मातरम गाने के मसले ने जोर पकड़ा l ये दुखद ही है कि भारत में रहने, भारत में खाने, और भारत में पीने वाले यहाँ का राष्ट्रगीत गाने की साफ़ मनाही कर देते हैं l हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने एक फैसला सुनाते हुए पूरे राज्य में स्कूलों, सरकारी दफ्तरों में वन्दे मातरम को गाना ज़रूरी कर दिया और उस के बाद से एक बहस और छिड़ गयी कि क्या देश का राष्ट्रगीत गाने के लिए भी कोर्ट को डंडा चलाना पड़ेगा l

कोर्ट का आदेश आया और फिर एक बार मुस्लिम धर्मगुरुओं का एक तबका खड़ा हो गया इसका विरोध करने के लिए यानि देश का बँटवारा हुआ, पाकिस्तान बन गया, जिन्ना चले गए, लेकिन वो सोच यहीं रह गयी l इस बात का जवाब इन लोगों के पास शायद ही हो कि अगर चरख़ा, सत्याग्रह और अहिंसा आज़ादी की लड़ाई के हथियार थे तो वन्दे मातरम नहीं था क्या ??? निश्चित तौर पर था लेकिनफिर वन्दे मातरम के लिए आज तक अदालती लड़ाइयाँ क्यों चल रही हैं?

अचानक मुस्लिम धर्म गुरुओं का एक तबक़ा फिर से उठ खड़ा हुआ है कि ये वन्दे मातरम तो धर्म के ख़िलाफ़ है! कुछ मौलाना कह रहे हैं कि इस्लाम अल्लाह को नमन करना सिखाता है माँ-बाप या मुल्क को नहीं!

मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गयी और बस इसके बाद इस मुद्दे ने सोशल मीडिया पर आग पकड़ लीl और हो भी क्यों न, आज़मी के इस बयान से हर देशभक्त की भावनाओं को ठेस पहुंची हैl उन्होंने देश का अपमान किया हैl मशहूर पत्रकार श्वेता सिंह ने भी आज़मी की निंदा करते हुए ये ट्वीट अपनी ट्विटर वॉल पर डाला-

जैसे ही ये ट्वीट श्वेता सिंह ने डाला, एक मुस्लिम लड़के ने दो कदम आगे बढ़कर एक ऐसा ट्वीट किया जिससे न सिर्फ देश का अपमान हुआ बल्कि पत्रकारों पर भी इस लड़के ने अपने ट्वीट से हमला करते हुए कहा-

इस बेहद अपमानजनक ट्वीट पर श्वेता सिंह की नज़र गई तो उन्होंने इस लड़के को मुँह-तोड़ जवाब देते हुए कहा- भाई साहब, मुझे 70 का होने में कुछ साल बाकि हैं अभी। और हां। देश के लिए गोदी पत्रकार बोलो या भक्त, मुझे प्रशंसा लगती है। #Vandemataram,”

वैसे सवाल ये है कि इस्लाम ने क्या ये मुहम्मद अली जिन्ना के नींद से जागने के बाद सिखाया? क्योंकि 1905 में बंगाल विभाजन रोकने के लिए जो बंग भंग आंदोलन चला उसमें किसी ने हिंदू मुसलमान के आधार पे वन्दे मातरम का बहिष्कार नहीं किया l

जब तक कि मुस्लिम लीग का बीज नहीं पड़ गया, तब तक कांग्रेस पार्टी के सारे अधिवेशन वन्दे मातरम से शुरू होते रहे और 1923 के अधिवेशन में मुहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस के अधिवेशन की शुरुआत वन्दे मातरम से करने का विरोध किया और मंच से उतर के चले गए l  दिलचस्प बात ये कि तब मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे l

इसके बाद 1938 में मुहम्मद अली जिन्ना ने खुले तौर पर पार्टी के अधिवेशनों में वन्दे मातरम गाए जाने के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी और तभी से जिन्ना का समर्थन करने वालों ने वन्दे मातरम का विरोध करना शुरू कर दिया l

14 अगस्त 1947 की रात आज़ाद भारत में संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत ही वन्दे मातरम के साथ हुई थी l क्या उस वन्दे मातरम को धर्म के तराज़ू में रखने वाले देश के प्रति अपनी ही सोच को ओछा साबित नहीं कर रहे ?या इस्लाम के झंडे तले दुनिया को देखने की ख़्वाहिश रखने वाले लोग ‘देश’ या ‘देश प्रेम’ जैसे किसी ‘कॉन्सेप्ट’ से ही इत्तेफ़ाक नहीं रखते?

सवाल कई उठ रहे हैं और सबसे बड़ा सवाल ये कि शहीद अब्दुल हमीद या शहीद अश्फ़ाक उल्लाह ख़ां ने वन्दे मातरम के नारे लगा कर जो शहादतें दीं क्या वो धर्म के पलड़े में रख के तौली जाएँगी?

सवाल ये कि श्रीलंका या इंडोनेशिया के मुसलमान अगर देश के सम्मान में लिखा गया गीत शान से गाते हैं तो क्या वो कम मुसलमान हो जाते हैं?

सवाल ये भी कि बांग्लादेश के मुसलमान क्या मुसलमान नहीं क्योंकि बांग्लादेश के राष्ट्रगान में आठ बार माँ शब्द आता है तो ऐसे में सवाल ये कि क्या बांगलादेश के मुसलमान इस राष्ट्रगान को नहीं गाते ? ये सवाल इसलिए क्योंकि देश के कई मुस्लिम धर्मगुरुओं और मुस्लिम राजनेताओं ने वन्दे मातरम का ये कहकर विरोध किया कि इसमें माँ शब्द के आने से वो इसे गा नहीं सकते l आपको बता दें कि बांग्लादेश का राष्ट्रगान अमार सोनार बांगला की रचना भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने ही की और ये गीत उनहोंने 1905 में लिखा था l

सवाल कई हैं लेकिन जवाब देने की हिम्मत किसी की नहीं l हाँ ये ज़रूर कह देते हैं कि सर कटा लेंगे लेकिन वन्दे मातरम नहीं गायेंगे l ज़नाब ये उस देश का राष्ट्रगीत है, जहाँ आप रहते हैं, जिसकी फिजाओं में आप सांस लेते हैं, जिसकी धरती पर उगा अन्न आप खाते हैं और जिसकी कल कल करती नदियों का पानी आप पीते हैं l ठीक है आप नहीं गाइए, कोई ज़बरदस्ती नहीं लेकिन क्या फिर आपको भारत में रहने का हक़ होना चाहिए ?????

सवाल ये इसलिए भी मुखर है क्योंकि क्या भारत के अलावा आप किसी और देश में जाकर ये कह सकते हैं कि आप वहां का राष्ट्रगीत नहीं गायेंगे और आप वहां रहेंगे भी ? किसी मुस्लिम देश में तो बिलकुल नहीं l

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