Wednesday, January 17, 2018
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मोदी सरकार का एक और बड़ा धमाका – सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को किया ख़त्म – ये है पूरा फ़ैसला – फ़ैसले पर खिसियाये कट्टरपंथी बोले……..

पिछले काफी समय से देशभर में तीन तलाक की प्रथा को लेकर बहस चल रही है. अब मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया l सुप्रीम कोर्ट ने 6 महीने तक तो ट्रिपल तलाक़ पर पूरी तरह रोक लगा दी है और केंद्र की मोदी सरकार को ये आदेश दिया है कि वो इस पर क़ानून बनाये l सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने इस मामले पर बोलते हुए ट्रिपल तलाक़ में कई खामियां बतायीं और अब से लेकर 6 महीने तक इस पर रोक लगा दी l

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ मंगलवार को अपना फ़ैसला सुनाया और पांच में से 3 जजों ने ट्रिपल तलाक़ यानि तीन तलाक़ को असंवैधानिक क़रार दिया l इसका मतलब ये है कि भारत में अब तीन तलाक़ पर रोक लग गयी है l

इस मामले में मुख्‍य न्‍यायाधीश जेएस खेहर ने अपने फैसले में कहा कि ट्रिपल तलाक पर छह महीने के लिए रोक लगाई जाए और सरकार इस पर कानून लेकर आए l इसके बाद 3 जजों ने कहा कि तीन तलाक़ किसी भी तरह क़ानून के दायरे में नहीं है और ये असंवैधानिक है l

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा कि वो इस पर क़ानून बनाये l यानि अब केंद्र सरकार अगर तीन तलाक़ को रोकने के लिए क़ानून लाती है तो इसे मुलिम विरोधी नहीं माना जाएगा l

सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए मुस्लिम महिलाओं को बड़ी राहत दी और फौरी तौर से यानि आज से ही देश में तीन तलाक़ को ख़त्म कर दिया l

उधर सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद कट्टरपंथी मुस्लिम इस फ़ैसले को इस्लाम विरोधी मान रहे हैं और उनका साफ़ कहना है कि वो सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को और ज्यादा जजों की बेंच तक ले जाएगा ; इतना ही नहीं कई मौलवियों और कट्टरपंथियों का कहना है कि वो सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को नहीं मानेंगे और उनके लिए शरियत क़ानून ही सब कुछ है l

आपको बता दें कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी ओर से दिए हलफनामे में कहा था कि वह तीन तलाक की प्रथा को वैध नहीं मानती और इसे जारी रखने के पक्ष में नहीं है l सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने माना था कि वह सभी काजियों को अडवाइजरी जारी करेगा कि वे ट्रिपल तलाक पर न केवल महिलाओं की राय लें, बल्कि उसे निकाहनामे में शामिल भी करें. अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं l

इससे पहले 18 मई को सुनवाई के आखिरी दिन कोर्ट ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) से पूछा था कि क्या निकाह के समय ‘निकाहनामा’ में महिला को तीन तलाक के लिए ‘ना’ कहने का विकल्प दिया जा सकता है? जस्टिस खेहर ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल से पूछा- क्या यह संभव है कि किसी महिला को निकाह के समय यह अधिकार दिया जाए कि वह तीन तलाक को स्वीकार नहीं करेगी? कोर्ट ने पूछा कि क्या AIMPLB सभी काजियों को निर्देश जारी कर सकता है कि वे निकाहनामा में तीन तलाक पर महिला की मर्जी को भी शामिल करें l

27 को रिटायर होंगे जस्टिस खेहर

इस मामले पर सुनवाई करने वाली पांच सदस्‍यीय बेंच की अध्‍यक्षता चीफ जस्टिस जेएस खेहर कर रहे हैं. जस्टिस खेहर 27 अगस्‍त को रिटायर होंगे. ऐसे में माना जा रहा है कि इस मामले में महत्‍वपूर्ण फैसला आ सकता है. जस्टिस खेहर के बाद जस्टिस दीपक मिश्रा अगले सीजेआई होंगे.

तीन तलाक रद्द हुआ तो केंद्र नया कानून लाएगा

अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ से सुनवाई के दौरान कहा था, ‘अगर अदालत तुरंत तलाक (तीन तलाक) के तरीके को निरस्त कर देती है तो केंद्र सरकार मुस्लिम समुदाय के बीच शादी और तलाक के नियमन के लिए एक कानून लाएगी.’ रोहतगी ने यह बात तब कही थी, जब अदालत ने उनसे पूछा कि अगर इस तरह के तरीके (तीन तलाक) निरस्त कर दिए जाएं तो शादी से निकलने के लिए किसी मुस्लिम मर्द के पास क्या तरीका होगा?

क्या है मामला

मार्च, 2016 में उतराखंड की शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी. बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है l कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकी रहती है. वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है l

तीन तलाक के पक्ष में नहीं केंद्र

गौरतलब है कि 5 जजों की बेंच इस मुद्दे पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट में यह सुनवाई 6 दिनों तक चली थी. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे में साफ किया था कि वह तीन तलाक की प्रथा को वैध नहीं मानती और इसे जारी रखने के पक्ष में नहीं है. सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने तीन तलाक को ‘दुखदायी’ प्रथा करार देते हुए न्यायालय से अनुरोध किया था कि वह इस मामले में ‘मौलिक अधिकारों के अभिभावक के रूप में कदम उठाए.’

इन पांच जजों की बेंच ने सुनाया फ़ैसला

  1. चीफ जस्टिस जेएस खेहर
  2. जस्टिस कुरियन जोसेफ
  3. जस्टिस आरएफ नरिमन
  4. जस्टिस यूयू ललित
  5. जस्टिस अब्दुल नज़ीर

 

ये थी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की दलील

वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि तीन तलाक का पिछले 1400 साल से जारी है. अगर राम का अयोध्या में जन्म होना, आस्था का विषय हो सकता है तो तीन तलाक का मुद्दा क्यों नहीं l

ख़त्म होनी चाहिए तीन तलाक की प्रथा

वहीं मुकुल रोहतगी ने दलील थी कि अगर सऊदी अरब, ईरान, इराक, लीबिया, मिस्र और सूडान जैसे देश तीन तलाक जैसे कानून को खत्म कर चुके हैं, तो हम क्यों नहीं कर सकते. अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने पीठ से कहा था, ‘अगर अदालत तुरंत तलाक के तरीके को निरस्त कर देती है तो हम लोगों को अलग-थलग नहीं छोड़ेंगे. हम मुस्लिम समुदाय के बीच शादी और तलाक के नियमन के लिए एक कानून लाएंगे.’

पीएम मोदी ने लाल किले से भी की थी बात

15 अगस्त को लाल किले से दिए अपने भाषण में पीएम ने कहा कि तीन तलाक के कारण कुछ महिलाओं को काफी परेशानी झेलनी पड़ रही हैं, तीन तलाक से पीड़ित बहनों ने देश में आंदोलन खड़ा किया, मीडिया ने उनकी मदद की. तीन तलाक के खिलाफ आंदोलन चलाने वाली बहनों का मैं अभिनंदन करता हूं, पूरा देश उनकी मदद करेगा l

महिला अधिकारों की लड़ाई

तीन तलाक पर केंद्र का कहना था कि यह मामला बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का नहीं है. यह एक धर्म के भीतर महिलाओं के अधिकार की लड़ाई है. इस मामले में विधेयक लाने के लिए केंद्र को जो करना होगा वह करेगा, लेकिन सवाल ये है कि सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा? इसके बाद चीफ जस्टिस ने कहा कि अस्पृश्यता, बाल विवाह या हिंदुत्व के भीतर चल रही अन्य सामाजिक बुराइयों को सुप्रीम कोर्ट अनदेखा नहीं कर सकता है. कोर्ट इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से इनकार नहीं कर सकता l

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