Wednesday, January 17, 2018
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केंद्र की मोदी सरकार का सबसे कड़ा फ़ैसला – पहली बार होगा भारत में ऐसा – कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों के उड़े होश

नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक कड़े क़दमों के बाद अब मोदी सरकार ने सबसे बड़ा राजनीतिक कदम उठा दिया है l देश की केंद्र सरकार ने अब जो कड़ा फ़ैसला लिया है, उस से भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है l हांलाकि माना जा रहा है कि इस कड़े कदम का भी विपक्ष पुरजोर विरोध करेगा लेकिन कड़े फ़ैसले लेती रही मोदी सरकार ने एक बार फिर विपक्ष की परवाह नहीं की है l

सांसदों और विधायकों पर चल रहे आपराधिक मामलों के निपटारे को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है l केंद्र सरकार ने इन मामलों को निपटाने के लिए एक साल तक 12 स्पेशल कोर्ट चलाने पर सहमति जताई है l इन स्पेशल कोर्ट में करीब 1571 आपराधिक केसों पर सुनवाई होगी l ये केस 2014 तक सभी नेताओं के द्वारा दायर हलफनामे के आधार पर हैं l

केंद्र सरकार के इस फैसले से चुने हुए दागी विधायकों और सांसदों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दागी जनप्रतिनिधियों पर चल रहे मामलों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन पर सहमति जताई है।

2014 के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में 1,581 सांसदों और विधायकों पर संगीन अपराधों में 13,500 मुकदमे दर्ज हैं। जाहिर है कि तीन साल बाद अब यह आंकड़ा और बढ़ गया होगा। लेकिन, अब उम्मीद की जा रही है कि यदि सरकार दागी नेताओं पर मामलों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन करती है तो ऐसे नेताओं की संख्या में कमी आ सकेगी।

न्याय की धीमी प्रक्रिया के चलते मामले के निपटारे तक दागी नेता लंबे समय तक अपने पदों पर बने रहते हैं। केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह नेताओं पर दर्ज केसों की सुनवाई के लिए 12 विशेष अदालतों का गठन करेगी और इसके लिए 7.80 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।

इसके अलावा सरकार ने शीर्ष अदालत से कुछ वक्त की भी मांग की ताकि जनप्रतिनिधियों पर दर्ज मामलों की संख्या का सही पता लगाया जा सके। सरकार का कहना है कि नेताओं पर दर्ज केसों का सही आंकड़ा पता चलने के बाद ही यह फैसला लिया जा सकेगा कि कितनी स्पेशल अदालतों के गठन की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इन केसों का निपटारा एक साल के अंदर किया जाना चाहिए l कानून मंत्री की ओर से दाखिल हलफनामे में इस बात की पुष्टि हुई है l

आपको बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने दागी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की थी, जबकि केंद्र सरकार ने इसे खारिज करते हुए 6 साल की बैन को ही लागू रखने को कहा था l

गुजरात और हिमाचल चुनाव में वोटिंग से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताओं को करारा झटका देते हुए उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामलों की सुनवाई जल्द पूरी करने के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का प्लान पेश करने को कहा था l

कोर्ट का आदेश था कि छह हफ्ते में सरकार अपना ड्राफ्ट प्लान कोर्ट को सौंपे, जिसमें फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या और समय की जानकारी भी रहे, ताकि किसी भी दागी जनप्रतिनिधि के खिलाफ दाखिल मुकदमे का निपटारा साल भर के भीतर हो जाए l

आपको बता दें कि अभी हाल ही में आई एडीआर ने 4852 विधायकों और सांसदों के हलफनामे का अध्ययन करने के बाद यह रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें दागी नेताओं को लेकर कई खुलासे हुए थे l

जिन 51 जनप्रतिनिधियों ने अपने हलफनामे में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध की बात स्वीकार की है उनमें से 3 सांसद और 48 विधायक हैं l 334 ऐसे उम्मीदवार थे जिनके खिलाफ महिलाओं के प्रति अपराध के मुकदमे दर्ज हैं, लेकिन उन्हें मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों ने टिकट दिया था l

हलफनामे के अध्ययन से यह बात सामने आई कि आपराधिक छवि वाले सबसे ज्यादा सांसद और विधायक महाराष्ट्र में हैं, जहां ऐसे लोगों की संख्या 12 थी जबकि दूसरे और तीसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल और ओडिशा हैं l

सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में ही कहा था कि नेताओं पर दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए अदालतों के गठन की जरूरत है। इसके बाद इस महीने की शुरुआत में अदालत ने एक बार फिर से केंद्र सरकार को स्पेशल कोर्ट्स के गठन की याद दिलाई।

शीर्ष अदालत का कहना है कि इससे जनप्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे मामलों की सुनवाई एक साल के भीतर हो सकेगी। स्पेशल कोर्ट्स के गठन की जरूरत पर ध्यान दिलाते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा ने कहा कि देश की 17,000 अदालतों में से हर एक के पास औसतन 4,200 केस हैं।

बीते महीने ही चुनाव आयोग ने भी कहा था कि दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों पर हमेशा के लिए चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अदालत से कहा कि राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगाने के लिए एक कानून बनाए जाने की जरूरत है।

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